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जनवरी - फरवरी 2020

देखते-देखते 2020 का भी नया वर्ष आ गया. पिछले साल में बहुत कुछ पाया, बहुत कुछ खोया भी. नये बच्चों ने जन्म लिया और बहुत से सदा के लिए सो भी गये. लेकिन ज़रा नजदीक से देखें और महसूस करें तो सब कुछ वैसा ही लगता है. मतलब जो हो रहा था, वह आगे भी चालू रहेगा, बदलाव कुछ होने वाला नहीं, कमियों, परेशानियों का समाधान कोई निकलने वाला नहीं. भारत के मिशन संस्थान ईश्वरीय सेवा के नाम पर चाहे कितने ही अपने को सुद्दढ़ता का राग अलापते रहें पर हकीकत यह है कि वे आर्थिक रूप से ढ़ुल-मुल हो चुके हैं. डायोसीज़ में पास्टरों को वेतन नहीं, चर्च की मरम्मत के लिए पैसा नहीं, मिशन कम्पाउंडों की हालत भी खस्ता हो चुकी है. अपनी परिस्थितियों से जूझती मसीही जनता को दो रोटी कमाने से फुर्सत नहीं, बिशपों और चर्च के ठेकेदारों को मिशन की भूमि और संपत्ति बेचने से फुर्सत नही. रविवार को अगर चर्च की इबादत में चर्च खाली पड़े हैं तो इसका कारण है कि मसीहियों में अब वह धार्मिक आस्था भी नहीं जो पहले कभी पाई जाती थी.


सेवा के नाम पर रोजाना नये-नये खड़े होने वाले प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, चंगाई के नाम पर तेल और वस्त्र बेचने वाले मसीही सेवक जैसे लोग मसीही चंगाई के नाम पर ईसाईयों को भ्रमित करने पर तुले हुए हैं. हालात यहाँ तक बिगड़ चुके है कि अब तो प्रार्थना करानी हो, कोई बहुत ही अधिक आवश्यक  प्रार्थना करानी हो तो उसके लिए पहले ही से निर्धारित रकम दान के रूप में आपको जमा करानी पड़ेगी अन्यथा अब दुआ भी आपके लिए निशुल्क नहीं है. बड़े-बड़े दुआ मसीही संस्थानों में गरीब ईसाई बेचारे क्या करें, जहां पर केवल 300 डौलर ही केवल दुआ कराने के लिए ही दान की रकम जमा करनी पडती है. यही अगर पारिवारिक दुआ है तो भारतीय मुद्रा में पहले आपको दान की रकम 3000 रूपये जमा करनी होगी. दुआ न हुई, मसीह की सेवा न हुई मानो 'जीज़स बिजनिस' हो गया? सोशल मीडिया पर छाये हुए प्रेरित, प्रोफेट्स, बगैर सेमिनरी पास किये हुए पास्टरों और प्रचारकों की आज की धारा में हर रोज़ बहायी जाने वाली देन है कि, हल्लिलूयाह बोलो और लंगडा भागने लगता है. 'प्रेज़ दी लार्ड' कहा नहीं कि अंधे की आँखें खुल जाती हैं. कहने को चाहे हम मसीही सेवक ही क्यों न कहें, बगैर बात का ढ़ोल ही क्यों न पीटते रहें, इस ढकोसली सेवा के नाम पर लोगों को भरमाकर लाखों-करोड़ों की भीड़ ही क्यों न जमा कर लें, पर इसमें कोई भी संदेह नहीं है कि इस प्रकार के कार्यक्रम मात्र पैसा बनाने के लिए ही किये जाते हैं. सीधे-साधे लोगों की आँखों में धूल झोंक कर धर्म-व्यवस्था की आड़ में गरीबों की अर्थ-व्यवस्था पर निशाना साधा जाता है. कोई इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है और ना ही एतिहासिक जानकारियों को सुनने और सीखने के लिए तैयार है कि धर्म की आड़ में हमेशा से ही महायाजको, याजकों और धर्म गुरुओं ने सत्य को दबाया है, धर्म-स्थल को व्यापार का घर बनाया है और सीधे-ईमानदारों ने अगर उनका विरोध किया है तो उन्हें सूली पर चढ़ाया है. कभी भी ऐसे धर्म-गुरुओं और प्रचारकों ने मसीही समाज के उत्थान की बात नहीं की. आज हमारी ज़िन्दगी झूठे मसीही प्रचारकों की बुलंद आवाजों के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है. पंजाब के प्रोफेट ने मरी लड़की को जीवित कर दिया, उसका दिया हुआ आशीषित दुआयी तेल बड़ा ही चमत्कारिक है, फलाने प्रेरित की सभा में 'होली स्पिरिट' का आगमन होता है, वहां कन्वेंशन हो रही है और फलां ईसाई साधू आ रहे हैं, नेशनल और इंटर नेशनल मसीही साहित्यकारों का आगमन है, नये मसीही लेखकों/लेखिकाओं का स्वागत है, यह सिखाने के लिए कि, मसीही लेखक/लेखिकाएं कैसे तैयार किये जायेंगे- हिन्दुस्तान की बहुत मशहूर सेमिनार है; सारा सोशल मीडिया इन्हीं बातों से भरा रहता है. ऐसी बातों से, इन कार्यक्रमों से नतीजा कुछ निकलता नहीं है. लोग आते हैं. अच्छे और स्वादिष्ट भोजन के मजे लेते हैं, हवाई जहाज में यात्रा करते हैं, इंजॉय करते हैं और चलते बनते हैं. ना ही कोई आत्मा बचती है और ना ही कोई कलमकार पैदा होता है.


उपरोक्त सारी बातों का नतीजा यह है कि अंग्रेजों के जमाने में जो थोड़ा सा भी आत्मिक लाभ मसीही सेवा के नाम पर हो रहा था, अब तो वह भी हाथों से निकलता नज़र आने लगा है. सी.एन.आई. की आर्थिक मंडी के कारण कमर टूट चुकी है. सिनड के पास पैसा नहीं है. पास्टरों को सेवा से कम अपनी नौकरी बचाने की फ़िक्र लगी रहती है. मसीहियत यहाँ तक खस्ता हो चुकी है कि ज़रा भी झगड़ा या विवाद, चाहे किसी भी बात के लिए क्यों हो, दुआ-बन्दिगी और आपसी मेल-मिलाप से सुलझाने की बात ही अब कहाँ रही है; मामला पलक झपकते ही पुलिस और कोर्ट में पहुँच जाता है.          
अब देखिये कि इस नये आने वाले साल में हमारी उम्मीदें पूरी हों, यही दुआ है. पिछले साल में जो गलत हुआ, जो पसंद नहीं था वह अब दोबारा न हो. यही कामना है, यही शुभ कामनाएँ है.

समाप्त.