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       मार्च - अप्रैल 2020

 

       यह संपादकीय लिखने से दो दिन पहले ही एक दुखद खबर मिली कि मसीही जगत के हिंदी मसीही कवि और लेखक श्री सी. एन. तिग्गा का आकस्मिक निधन हो गया है. खबर बहुत ही दुखभरी और झकझोर देने वाली थी. मसीही साहित्य जगत के रचनाकारों का घड़ा पहले ही से खाली था, उसमें से एक मोहरा और गिर गया. कोई कैसा भी क्यों हो, श्री तिग्गा की जगह कोई नहीं भर पायेगा. हांलाकि, चेतना में उनकी कुछेक रचनाएँ ही प्रकाशित हुई थीं, फिर भी वे चेतना से जुड़े हुए थे. उनके लेखन से मसीही साहित्य जगत में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं ने कितना श्रेय लिया होगा, यह एक अलग विषय हो सकता है. मसीही लेखन के अलावा वे जन-सामान्य लेखन के क्षेत्र से भी जुड़े रहे थे. चेतना परिवार उनके परिवार के दुःख में शामिल है और अपनी हार्दिक संवेदनाएं व श्रृद्धांजलि अर्पित करता है.
उपरोक्त दुःख का सदमा अभी समाप्त भी नहीं हो सका था कि जनवरी 17, 2020 को मसीही जगत के हिन्दी कवि श्री अरविन्द क्लैरेंस 'अज्ञानी' का भी दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. उनका जन्म 11 मार्च, 1956 को बरेली केंट, उत्तर प्रदेश में हुआ था. उनका बचपन का मसीही नाम 'इर्विन क्लैरेंस' था, पर स्कूल में अध्यापक ने 'अरविन्द' लिख दिया था, जो बाद में यही नाम प्रचिलित हो गया था. सबको मालुम है कि यह संसार किसी का भी स्थायी निवास नहीं है, लेकिन फिर भी, जब भी कोई प्रियजन हमसे अलविदा कहता है, तो दुःख तो होता ही है. चेतना परिवार की तरफ से इस महान कवि को हार्दिक संवेदनाएं और भावपूर्ण श्रंद्धाजलि अर्पित की जाती है.
कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है. तकरीबन 70 और 80 दशक के मध्य शिकोहाबाद मिशन कम्पाउंड में एक बे-हद दुखद घटना का जन्म हुआ था. प्रतिस्पर्धा और झगड़े का खेल आरम्भ हुआ और देखते ही देखते कैंपस में दो ग्रुप हो गये. मिशन की संपत्ति किसने बेची? किसने खरीदी? और किसने सी. एन. आई को छोड़ा, कौन उसमें से यू. सी. एन. आई में चला गया? ये अलग मुद्दे हैं. आज उस घटना को पचास साल हो चुके है. मिशन की सम्पत्ति को बचाने वाले, उसके खरीदने वाले, सी. एन. आई. और यू. सी. एन. आई. वाले; संब मर गये, खप गये, जमीन में दफ़न हो गये,  बर्बाद हुए, कोई भी एक इंच तक जमीन का हिस्सा अपने साथ नहीं ले जा सका- इस लड़ाई और मतभेदों का सारा अंजाम; किसी शायर का लिखा हुआ ये शेर याद आता है, 'ना ही खुदा मिला, ना विसाल-ए-सनम, ना इधर के हुए, ना उधर के हुए.' आज 82 साल पुराने अंग्रेंजों का बनाया हुआ चर्च भी ढा दिया गया है. देखने से अब पता ही नहीं चलता है कि कभी यहाँ पर कोई ईसाई बस्ती भी थी. जिसने जैसा बोया, उसने वैसा ही काटा भी.
आज वर्तमान में सहारनपुर के चर्च में भी बिल्कुल उपरोक्त जैसी ही घटना और झगड़े ने अपना पिटारा खोल दिया है. शिकोहाबाद ही चर्च के भूतपूर्व पास्टर जॉन वीसली के साथ सहारनपुर मिशन की भूमि के साथ विवाद खड़ा हुआ और जब मामला कोर्ट में पहुंचा तो जॉन वीसली ने सी. एन. आई के आगरा डायसीज़ से अपने पद से इस्तीफा दे दिया. जाहिर था कि जब इस्तीफा दे दिया तो नियमानुसार अपना चार्ज उन्हें नये आनेवाले पास्टर को देना भी  था और पास्टर हाउस भी खाली करना था. लेकिन उन्हें ऐसा न करना पड़े तो वे तुरंत ही सी. एन. आई. से हटकर यू. सी. एन. आई. का खुद को पास्टर घोषित करके वहां की हरेक वस्तु पर अपना अधिकार जताने लगे. कितनी मजे की बात है कि जगह वही, चर्च वही, कलीसिया और कम्पाउंड भी वही; जब वे काम करते थे तो खुद को सी. एन. आई का पास्टर बताकर सारी सुविधाएं और वेतन लेते थे और जब खुद ही हट गये तो वही जगह, वही स्थान, वही कलीसिया, चर्च आदि तुरंत बदलकर यू. सी. एन. आई के हो गये? कहने का आशय है कि शक्ल एक और मुखौटे दो? और यू. सी. एन. आई. भी वह कि जिसका एक भी कायदे का कार्यालय कहीं भी देखने को नहीं मिलेगा. अब देखिये कि इस विवाद की पराकाष्ठा भी कहाँ तक पहुंचती है? कौन बर्बाद होता है और कितनों के चैन खराब होते हैं? अब कुछ भी हो पर एक बात जरुर समझ में आती है कि, सारे संसार में जितने भी फसाद, युद्ध, लडाइयां, खून-खराबे, झूठ, बे-ईमानी, मार-काट और कोर्ट-कचेहरी के किस्से धर्म के नाम पर हुए हैं उतने किसी और बजह से नहीं. जब तक ये पृष्ठ आपके पास पहुंचेगा तब तक यीशु मसीह के पवित्र खून बहाने का महीना आ चुकेगा. यीशु मसीह का वह पवित्र खून जो उन्होंने पापियों के उद्धार के लिए बहाया था. मगर मनुष्य अपने पाप में क्या नहीं कर रहा है, ये हम और आप से छिपा नहीं है.

- समाप्त.