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संशय के दायरे
छोटी कहानी/शरोवन Microsoft Word - संशय के दायरे

 

 
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शक और संशय में कसी हुई मानव जि़न्दगी किसकदर एक दूसरे पर बोझ बन जाती है, इस सच्चाई की गवाही वहां का वह बोझिल वातावरण दे रहा था कि जिसको तैयार करने में नमिता ने शायद कोई भी देर नहीं लगाई थी।
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‘ये किसकी तस्वीर है?’
‘लड़की की।’
‘वह तो मैं भी देख रही हूं कि ये किसी लड़की की तस्वीर है। मगर ये लड़की कौन है, और किसकी है?’
‘क्या हर लड़की के चहरे पर ऐसा कोई नाम लिखा होता है जो ये बताये कि वह किसकी संतान है?’
‘हां। क्योंकि हर बच्चे का एक पिता जरुर होता है। जमाने की भी यही सच्चाई है।’
‘तो फिर हर तवायफों से पैदा हुई उनकी औलादों के लिये पूछो कि उनके जन्म देने वाले पिता कौन हैं?’
‘इसका मतलब ये हुआ कि तुम वेश्यागामी हो?’
‘शटअप। जो कभी भी मेरे चरित्र पर सन्देह किया?’
‘मैं कोई भी सन्देह नहीं कर रहीं हूं। मैं तो केवल यही जानना चाहती हूं कि जो लड़की अपने नाम के बाद मेरे पति का नाम लगाये वह मेरी कौन हो सकती है?’
‘नमीता, मैंने अपनी जि़न्दगी में दो काम ऐसे किये हैं कि जिनकी सफाई के लिये मैं चाहे कितने भी हाथ-पैर क्यों न मांरू, मगर कभी भी निर्दोष करार नहीं दिया जा सकता हूं।’
‘अच्छा। ज़रा बता सकते हो कि तुम्हारे वे दो काम कौन से हैं?’
‘एक चकलाघर की तवायफ ने मेरे हाथ में राखी बांधी। उसे अपनी बहन बनाया। उसको बचाने के लिये अपनी जान की बाज़ी लगाई। लेकिन ये और बात है कि में उसे चाहकर भी बचा नहीं सका था। अपने कर्तव्य को पूरा न कर पाने के प्रायश्चित में उसकी संतान को अपनी संतान बनाकर पाला। उसे बाकायदा पिता का नाम दिया और जिसे आज लोग नम्रता रायदास के नाम से जानने लगे हैं। उसी नम्रता रायदास को लेकर तुमने भी बखेड़ा खड़ा कर दिया है। तुम नमीता रायदास सैलानी हो, और वह केवल नम्रता रायदास है। वह अपने नाम के बाद मेरे परिवार का सर नेम नहीं लगाती है। तुम जितना अधिक बेसब्र, सन्देहशील और कठोर हो सकती हो, वहीं नम्रता तुमसे कहीं हदों तक नम्र भी है। कितनी अजीब बात है कि तुम बाकायदा मेरी पत्नी नमीता रायदास सैलानी हो, मगर किसी की भी मीता नहीं बन सकी। हमेशा से मेरे चरित्र और मेरे बूढ़े अतीत को लेकर के उसमें जोड़-तोड़ ही करती रही हो?’
‘अब ज़रा अपना दूसरा काम भी बता दो?’
‘मेरा दूसरा काम, अपने परिवार में अपने बड़ों का कहना माना और तुमसे विवाह करके सदा के लिये किसी की नज़्ारों में ऐसा बेवफा और धोखेबाज साबित हो गया कि जो कभी अपनी सफाई के लिये मुंह भी नहीं खोल सका। यदि तुम ये सोचती हो कि मैंने समाज की कीचड़ में खिले फूले को दलदल में सड़ने के बजाय सम्मान के साथ जीने लायक बनाकर कोई गुनाह किया है तो मैं तुम्हारा मुलाजि़म होते हुये कोई भी सजा भुगतने के लिये तैयार हूं।’
‘?’
रायदास के मुख से निकले शब्दों का भार जब नमिता के कानों से जा टकराया तो वह फिर उत्तर में एक शब्द भी नहीं कह सकी। केवल मूक बनी अपने उस पति को एक संशय से निहारती रही कि जिसके साथ विवाह के छब्बीस वर्ष व्यतीत करने के उपरान्त भी वह उसको शायद समझ नहीं सकी थी। सोचने लगी कि जिन सन्देहों के दायरे उसने खुद ब खुद अपने चारों ओर  बना लिये थे, क्या वह अब इस वर्तमान परिस्थिति में उनमें से कभी भी बाहर आ पायेगी या नहीं? ऐसा विचार आते ही वह रायदास के सामने से हटकर घर के दूसरे कमरे में चली गई। शक और संशय में कसी हुई मानव जि़न्दगी किसकदर एक दूसरे पर बोझ बन जाती है, इस सच्चाई की गवाही वहां का वह बोझिल वातावरण दे रहा था कि जिसको तैयार करने में नमिता ने शायद कोई भी देर नहीं लगाई थी।
समाप्त।