अमरीका से प्रकाशित होने वाली हिन्दी की मसीही पत्रिका


पीछे

दिन और रात

...

दिन और रातें एक थीं दोनों ही

हमारी जीने के लिए,

किस­किस को हम समझायें रोशनी और अंधकार में कोई फर्क नहीं।

 

ऐ समुद्र और गहरा हो, ओ सारी लहरो फैलाओ अपनी बाहें,

डूबना है मुझको सदा को,

फिर लौट कर आना नहीं।

 

ऐ रास्ते ठहर जा यहीं,

हमको जाना अब न कहीं,

सांसे सारी चुक गईं,

अब ज़िन्दगी की सहर नहीं।

—— शरोवन

 

 

 


रह गईं दामन में मेरे



जहां सागर की मचलती लहरों पर

फिसलती रवानियां हैं,

वहीं मेरी ज़िन्दगी के लिहाफ़ पर मरी हुई

हसरतों की कुछ कहानियां है।

 

सबके बीच रहते हुये भी यह ख्याल

दिल से कभी जाता नहीं,

क्यों मैं अकेला और मेरी तन्हाइंया हैं।

 

दे न सका कुछ उसे, अब जहां कहीं भी

हो खुशनुमां बसेरा उसका,

रह गईं दामन में मेरे उसकी शिकायतें

और कुछ गालियां हैं।

 

कितनी आसानी से जीत गईं जमाने की,

सारी जालिम रस्में,

अब पास में रह गई हैं मेरे हारी हुई

अपनी बाज़ियां हैं।

 

आसमां पर चढ़ने की कोशिशों में सहारा लिया था

जिस पेड़ का,

उसकी हाथों में रह गई हैं बस

टूटी हुई सूख़ी डालियां हैं।

 

कदम­कदम पर जिन्होंने मुझे हर पल मारा है,

वे कोई शख्स नहीं,

तकदीर में मिली हुई लड़ाइंया, बेवकूफ़ी

और मेरी बीमारियां है।

—— शरोवन