अमरीका से प्रकाशित होने वाली हिन्दी की मसीही पत्रिका



पीछे

 

शहनाइंया
·...


तन्हाइंयों में गल रही हैं

उदासियां मेरी,

यूं उड़ती है फूलों के साथ

महकार मेरी,

अब भी मेरे जिस्म को थप­थपा

रही हैं परछाइंया तेरी।

 

तू तो छिप गया आस की धुंध में

एक वास्ता देकर,

कुरेदती हुई ढूंढ़ रही हैं तुझको

आज भी छाइंया मेरी।

ज़िन्दगी है गुणा­भाग, जोड़­घटाना

और शेष के हिस्से,

सज़ा बन कर आई हैं मेरे हिस्से में

तेरे बीच की खाइंया मेरी।

 

तुझे भूलने की हजार कोशिशों में बढ़ गई हैं
स्मृतियां तेरी,
कैसे भूल जाऊं जो सुनी थीं कभी
द्वार पर शहनाइंया तेरी।
-शरोवन