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पीछे

 

 

चांदनी तुमको मुफ्त
में मिली 

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चांदनी तुमको मुफ्त में मिली.

तुम्हें क्यों रोना पड़ता है.
सूरज जैसी किस्मत अपनी
हमको तो सुलगना पड़ता है.

जिन राहों ने अश्क हमारे
प्यार के फूलों में बदले `
कैसे समझायें हम तुम्हें
वह रस्ता भी अब दूना लगता है.


एक समय था जब मंझधारों में फंसकर
भी हम पार गये थे `
वही जगह है, ` वही राह है `
फिर क्यों दूर किनारा लगता है.

तन्हाइयों ने डर कर जब सन्नाटों से
मुहब्बत कर ली है, `
अपनी फूटी किस्मत देखो
सूरज होकर अब दिये की लौ से
भी डर लगता है।

जिन हालात ने तुम से दूर चलना
सिखलाया है हमको `
वह बातें ` वह घड़ियां भी तुमको बताते डर लगता है।

जिन बातों ने प्यार की डोर कतरन कतरन काटी `
उन बातों से बचकर अब वापस
जाना ही अच्छा लगता है।

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चुनाव

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विधान सभा की चुनाओं का मौसम था `
दूर एक ढाबे की गंदी बैंच पर बैठे `
किस्मत के मारे गरीब कवि ने दूर से ही देखा कि `
नेता जी आये हैं मंच पर `
तालियों की गड़गड़ाहट के साथ.
तंग ` परेशान `अभावी जनता ने आंखें उठाई
तो नेता ने भाषण की शुरूआत की `
बोले ` प्यारी जनता कुछ भी कहने से पहले
मैं यही कहूंगा कि `
वे अनेक हैं ` लेकिन हम एक हैं, `
वे दो हैं, ` हम एक हैं `
वे तीन हैं, ` हम एक हैं, `
वे चार हैं ` हम एक हैं, `
वे पांच ` छह, ` सात ` आठ , , , वगैरह, , ,वगैरह , , ,हैं, `
मगर हम एक हैं,.
वे बहुजन हैं, लेकिन हम फिर भी एक हैं.
तब बैठे हुये कवि को नई रचना का प्लॉट मिला `
जेब से कलम निकाली और हाथ में पकड़े अखबार पर ही लिखने लगा `
बसपा ` सपा ` भाजपा ` माकपा ` भाकपा ` अद्रपा `
राजग ` राजद ` रालोक ` द्रुमुक ` कांग्रेस ` इनेका, , , `
इतनी सारी विभिन्नताओं में भी ये कैसा राग है, `
देश की अंखडता का `  
सब एक हैं,
फिर भी अनेक हैं.