New Picture (17)

New Picture (42)

रेलवे स्टेशन की
सीढ़ियों से
नीचे

०००

कहानी
शरोवन

टिमटिम करते सितारों की ठंडी सिसकती अंह्यिायारी रात के चुप्पी भरे माहौल में जब अचानक से किसी तारे ने टपकते हुये घबरा कर अपना दम तोड़ दिया तो ्र निराश और बहुत ख़ामोश बैठे हुये नीरव का दिल भी अचानक किसी अज्ञात भय से कंप¬कंपा गया। भटकोई नामक रेलवे के इस छोटे से स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर बैठे हुये नीरव को काफी देर हो चुकी हृाी। डूबती हुई शाम के ह्याुंह्यालके में वह यहां आया हृाा ्र पर मंडरोक जाने वाली उसकी टे्रन छूट चुकी हृाी। दूसरी गाड़ी सुबह नौ बजे जानी हृाी। शाम से भूर्खाप्यासा वह यहां स्टेशन पर आ गया हृाा। छोटा सा स्टेशन होने के कारण कुछ खास वहां पर खाने को भी नहीं हृाा। सारे माहौल में एक सन्नाटा ्र और अजीब सा सूनापन समाया हुआ हृाा। रात अंह्योरी हृाी। चांद नदारद हो चुका हृाा। दूर¬दूर तक स्टेशन से केवल सूनसान खेतों के अलावा कुछ भी नहीं दिखाई देता हृाा। केवल कभी¬कभार खेतों की तरफ से किसी सियार या फिर कोई जंगली जानवरों के चिल्लाने की भयानक आवाज़ सुनाई दे जाती हृाी। जिस गाड़ी से सुबह में नीरव को जाना हृाा उसका इंजन ही केवल शन्टिंग कर रहा हृाा। कुछेक नीरव के समान यात्री हृो जो मुंह ढांक कर चुपचाप सो गये हृो। पन्दरह¬बीस मिनट के अन्तर पर कोई एक्सप्रेस टे्रन सारे प्लेटफॉर्म की ख़ामोशी का गला घोंटती हुई पल भर में ही निकल जाती हृाी। लेकिन उदास और बहुत चुप बैठे हुये नीरव को अपने आस¬पास की इन समस्त बातों का जैसे कुछ भी आभास नहीं हृाा। यूं भी मनुष्य जब अपने विचारों में लीन हो जाता है तो फिर उसे किसी भी बात का कोई होश नहीं रहता है। नीरव भी हरेक बात से बेखबर बना केवल दूर आकाश में छोटी¬छोटी टिर्मटिमाती हुई तारिकाओं को निहार लेता हृाा। कौन जानता हृाा कि इन नादान तारिकाओं से उसके जीवन का कितना बड़ा संबह्या है। इसीलिये जब किसी तारे ने आकाश में अपना दम तोड़ा हृाा तो नीरव का भी मारे अफसोस के जैसे कलेजा बाहर आ गया हृाा।
तारा। यही नाम तो है ्र जिसने उसके जीवन में एक अनूठे ढंग से कभी प्रवेश किया हृाा। नीरव को खूब याद है जब वह रक्षाबंह्यान वाले दिन सोनागिरि से वापस आया हृाा। ट्रेन से उतरते ही वह प्लेटफॉर्म से नीचे जैसे ही वह सीढ़ियों से उतरा हृाा तो एक बारह साल की लड़की को अपने हाहृा में राखियां पकड़े देख ठिठक गया हृाा। वह कुछ सोचता तभी वह लड़की अपने हाहृा में राख़ी का डोरा पकड़े उसके सामने आ गई। फिर उसे देखकर बोली ्र
“भाई साहब ्र रक्षाबंह्यान है। राख़ी बंह्यावायेंगे आप। केवल पच्चीस पैसे में है?”
“!!” तब कुछ और ना सोचते हुये नीरव ने अपना हाहृा उसके सामने बढ़ा दिया हृाा। फिर राख़ी बंह्या जाने के पश्चात जब नीरव ने उसे पच्चीस पैसे के स्हृाान पर एक रूपया दिया तो वह लड़की चौंक गई।
“बहन¬भाई का रिश्ता है। उसकी कीमत एक रूपये में भी नहीं आंकी जाती है। यह केवल भाई¬बहन के पवित्र रिश्ते के शगुन के लिये है। रख लो।”
नीरव ने कहा तो वह लड़की हल्के से मुस्कराई और रूपया हाहृा में हृााम कर दूसरी तरफ मुड़कर दूसरे अन्य आने¬जाने वाले यात्रियों को ताकने लगी।
“राख़ी बांह्याकर अपना भाई तो बना लिया है ्र अब अपना नाम तो बता दो।” तभी नीरव ने उससे कहा तो वह लड़की तुरन्त मुड़ी और नीरव को देखने के पश्चात बोली ्र
“तारा।” कहते हुये उसने अपने मोतियों समान दांत चमका दिये। उस लड़की के सामने के दांतों की पंक्ति के दांत बिख़रे हुये हृो ्र और नीचे की पंक्ति के पीछे की तरफ तीन या चार दांत अतिरिक्त भी हृोऌ लेकिन उसके दांतों के इन बिख़रावपन में भी उसके हंसने में एक अनूठी खुबसूरती हृाी। शायद उसके शरीर में उसकी गरीबी के साहृा उसकी सुन्दरता की यही एक अकेली अमीरी भी हृाी।
नीरव काफी देर तक उस लड़की को निहारता रहा। सोचने लगा कि ्र भाई¬बहन का रिश्ता तो यूं भी कच्चे ह्याागों से बंह्या जाने के पश्चात जंजीरों से भी कहीं ज्यादा मजबूत हो जाता है। पर यह लड़की क्या जाने ्र इस रक्षाबंह्यान का महत्व? आज के युग में वक्त की मार और आर्हिृाक तंगी ने इस पवित्र त्यौहार को भी पैसों में तौल दिया है। वह लड़की लोगों के हाहृों में इसलिये राख़ियां नहीं बांह्या रही हृाी कि सचमुच में उसने किसी पवित्र रिश्ते की बात सोच रखी होगी ्र लेकिन इस कारण बांह्या रही हृाी ताकि उसको चार पैसों की आमदनी हो जाये। फिर उसकी राख़ियां उन लोगों के लिये भी एक आकर्षण हृाीं जिनकी कोई बहन नहीं हृाी।
नीरव घर चला आया। रक्षाबंह्यान भी चला गया। नीरव काफी दिनों तक उस लड़की के उस कच्चे ह्याागे को अपने हाहृा की कलाई में बांह्यो रहा। सोचता रहा कि काशÁ विह्यााता ने उसे भी कोई उसकी सगी बहन दी होती। फिर कुछ दिनों के पश्चात अचानक से उसका ह्याागा नहाते समय टूट गया और पानी में बहकर कहीं गुम भी हो गया। फिर और अह्यिाक दिन बीत गये तो नीरव के लिये यह घटना भी आई¬गई हो गई। वह अपने कामों में व्यस्त हो गया। उसके कॉलेज की शिक्षा समाप्त हुई और वह नौकरी भी करने लगा। देखते¬देखते ज़िन्दगी के पन्द्रह साल गुज़र गये। उसका विवाह हो गया और वह अपनी गृहस्हृाी में व्यस्त हो गया। किस्मत ने उसे एक बच्ची की जिम्मेदारियां और उसके सुन्दर भविष्य का उत्तरदायित्व उसकी झोली में डाल दिया। वह एक लड़की का पिता भी बन गया। उसकी लड़की किन्डरगार्टन में गई तो उसको लाने¬र्लेजाने का एक काम भी उसके कंह्यों पर आ पड़ा।
फिर एक दिन अचानक से उसके जीवन में एक और अनहोनी सी घटना घट गई। वह एक दिन अपनी लड़की के स्कूल उसकी फीस भरने गया तो कार्यालय में एक जार्नीपहचानी सी युवती जो लिपिक हृाी की सूरत को देखकर चौंक गया। बड़ी देर तक वह सोचता रहा कि उसने इस जानी¬पहचानी सी सूरत को आज से पहले कहां देखा है। काफी देर तक सोचने के बाद भी जब नीरव कुछ समझ नहीं सका तो उसने फीस जमा की और जब उस युवती ने उसको रसीद हृामाते समय ह्यान्यवाद कहा तो वह उसके सामने के बिख़रे हुये दांत देखकर सहसा ही चौंक गया। तुरन्त ही वह सोचने लगा कि उसने इससे पहले इस जानी¬पहचानी सी युवती को कहां देखा है? बहुत देर तक सोचने के पश्चात उसने मन ही मन सोचते हुये खुद ही कहा कि ्र ‘नहीं ्र यह संभव नहीं हो सकता है। पच्चीस पैसों में राख़ी के कच्चे ह्याागे बेचकर अपना पेट पालने वाली ्र एक झोपड़¬पट्टी में रहने वाली गरीब लड़की किसी स्कूल के दफ्तर में काम करे! कैसे हो सकता है? यही सोचते हुये नीरव ने फिर एक बार उस युवती को देखा ्र वह युवती उसकी परेशान मनोदशा से पूरी तरह से बेफिक्र सिर झुकाये अपना काम करने में व्यस्त हृाी। फिर नीरव को जब कोई सन्तोष नहीं हुआ तो उसने उस युवती को फिर एक बार निहारा और अपना सन्देह दूर करने के लिये दूर एक कोने में बैठे हुये अन्य बुजुर्ग क्लर्क के पास जाकर पूछा।
‘तारिका निर्मेश नाम है इनका। अभी तीन महिने पहले ही अपना स्हृाानान्तरण करवाकर यहां आई हैं। आप इतना परेशान क्यों होते हैं। यदि कुछ विशेष है तो स्पष्ट बात करने में हर्ज़ ही क्या है?”
‘हां ्र हर्ज़ तो कुछ भी नहीं है। अगर मेरा भ्रम गलत निकला और जो बात मैं जानना चाहता हूं ्र उससे किसी को भी परेशानी हो सकती है।’ कहता हुआ नीरव उस दिन स्कूल से चुपचाप चला आया। लेकिन उस दिन के बाद से नीरव को इतना अवश्य ही हुआ कि वह अक्सर ही स्कूल अपनी बच्ची को छोड़ने और वहां से लाने के बहाने जाने लगा। साहृा ही यह जानकारी भी उसने पता लगाई कि ्र उसके हाहृा में राख़ी बांह्याने वाली लड़की और यह क्लर्क युवती ्र दोनों ही उसी अमराव शहर की रहने वाली हैं ्र जिसके रेलवे स्टेशन के बाहर उस लड़की ने कभी उसके हाहृों में राख़ी बांह्याी हृाी। फिर दोनों का नाम भी काफी मिलता¬जुलता सा है। उस लड़की ने अपना नाम तारा बताया हृाा और इसका भी नाम तारिका है। दोनों ही के नाम काफी सीमा तक मिलते हैं। यह भी हो सकता है कि राख़ी बांह्याने वाली लड़की का पूरा नाम भी तारिका ही हो और उसे सब तारा नाम से बुलाते हों। लेकिन इन बातों से क्या होता है। नाम एक से यदि मिल भी जायें तो इस संयोग से कोई ठोस निर्णय तो लिया नहीं जा सकता है। बगैर उस युवती से स्पष्ट बात करने से पहले कोई भी अनुमान लगाना मूर्ख़ता ही होगी। इतना सब कुछ सोचने के बाद नीरव ने तब अपना निर्णय ले लिया कि किसी अच्छे अवसर पर वह अपना यह भ्रम अवश्य ही दूर कर लेगा ्र और इस युवती से स्पष्ट पूछ लेगा कि वास्तव में वह वही लड़की है जो कभी अमराव नामक रेलवे स्टेशन से बाहर जाने वाली सीढ़ियों से नीचे उतरने वाले यात्रियों के हाहृों में राख़ियां बांह्याकर चार पैसे अपनी रोज़ी¬रोटी के लिये कमाती हृाी।
फिर एक दिन वह भी आ गया। संयोग से उस दिन भी रक्षाबंह्यान ही हृाा। उसकी लड़की का स्कूल इस त्यौहार के कारण आह्यो दिन की छुट्टी कर रहा हृाा। नीरव को अपनी लड़की को स्कूल से लेने जाना पड़ा। फिर जब वह अपनी लड़की की कक्षा की तरफ जा रहा हृाा तो संयोग ही हृाा कि वही क्लर्क युवती उसी की लड़की की कक्षा में से निकलकर उसी के सामने की तरफ आ रही हृाी। शायद वह किसी काम से उस कक्षा में गई होगी। नीरव ने उसकी व्यस्तता देखकर अनुमान लगाया। फिर जैसे ही वह युवती उसके सामने से गुज़रने को हुई ्र नज़रें मिलने पर औपचारिक अभिवादन के पश्चात नीरव से जब नहीं रहा गया तो उसने उस युवती को टोक दिया। बोला ्र
“सुनिये! ”
“?” तारिका के कदम अचानक ही ठिठक गये। वह मुड़कर नीरव को एक संशय से देखने लगी।
“आज रक्षाबंह्यान है ्र राख़ी नहीं बांह्योगी आप मेरे हाहृा में ?”
“!!” जी? तारिका बड़ी हैरानी से नीरव का चेहरा पहचानने की कोशिश करने लगी। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक देखकर नीरव का सन्देह यकीन में बदलने लगा। तारिका कुछ कहती इससे पूर्व ही नीरव ने उससे दूसरी बात कही ्र
“आपका नाम तारा है?”
“जी हां?”
“आप अमराव की रहने वाली हैं?”
“जी हां?”
“आपने अभी तक मुझे पहचाना नहीं ?”
“शायद नहीं?” तारिका ने आश्चर्य से नीरव को देखते हुये कहा तो वह बोला ्र
“पहचानेगी भी कैसे। साल बीत गये हैं जब आपने अमराव के रेलवे स्टेशन के बाहर कभी सीढ़ियों से नीचे उतरते समय मेरे हाहृा में राख़ी बांह्याी हृाी।”
“वह मेरी मजबूरी हृाी। पैसों की आवश्यकता के कारण तब मैंने ना जाने कितनों को अपना भाई बनाया होगा ्र कुछ याद नहीं।” कहते हुये तारिका का सिर झुक गया। वह नीचे फर्श की तरफ देखने लगी।
“वर्षों पहले की आप अपनी मजबूरी को हकीकत में बदल सकती हैं।”
कहते हुये नीरव ने अपना हाहृा आगे बढ़ाया तो तारिका की आखें भर आई। वह इह्यार्रउह्यार ्र अपने आस¬पास देखने लगी। फिर तुरन्त ही उसने अपने बालों का रिबन निकाला और उसे नीरव के हाहृा की कलाई में बांह्या दिया। तब नीरव ने अपनी जेब से पच्चीस पैसे का सिक्का निकाला और उसे तारिका के हाहृा में रख दिया। उस सिक्के को देखकर तारिका मुस्कराते हुये बोली ्र
“वर्षों पहले तुमने मुझे एक रूपया दिया हृाा ्र और आज वह पच्चीस पैसों में बदल गया?”
“वह कागज़ का हृाा ्र शायद फट भी गया होगा। यह ठोस स्टील का बना हुआ है। इसका मूल्य उस एक रूपये से कहीं बढ़कर है।”
“मैं जानती हूं।” तारिका मुस्कराई।
“अच्छा ्र अब मैं चलूं। मेरी बेटी मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी।” कह कर नीरव जाने लगा तो तारिका ने उसे रोका। बोली ्र
“आज सचमुच में बहन बनाया है ्र अपना नाम भी नहीं बतायेंगे मुझे।”
“नीरव।”
“शाम को घर पर आइये। तब बहुत ही अच्छी वाली राख़ी बांह्याूगी मैं।”
तारिका ने कहा तो नीरव ने उसको आने का आश्वासन दे दिया। उसके बाद नीरव तारा के घर गया। वहां पर उसने उसे अपने पति से भी मिलाया। उसका पति किसी कंपनी में पहले ड्राइवर हृाा ्र पर बाद में वह अपनी टैक्सी चलाने लगा हृाा। नीरव ने भी तारा को अपनी पत्नि और बेटी से परिचय करा दिया। साहृा ही नीरव को तारा के पिछले अतीत के बारे में भी बहुत कुछ मालुम हो गया। तारा एक निहायत ही गरीब परिवार की एकलौती लड़की हृाी। वह पढ़लिखकर खुद अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हृाी। उसके पिता की आर्हिृाक दशा उसे पढ़ा नहीं सकती हृाी। इसलिये वह अक्सर ही विशेष अवसरों ्र जैसे होली पर रंग बेचना ्र दीवाली पर दिये और मोमबत्तियां बेचना तहृाा इसी प्रकार रक्षाबंह्यान पर राख़ियां आदि बेचकर अपनी पढ़ाई की पुस्तकों आदि के लिये पैसे जमा कर लेती हृाी। कुछ स्कूल की तरफ से वह अपनी फीस को मॉफ करवा लेती हृाी। सो इस प्रकार उसने किसी प्रकार हाईस्कूल की परीक्षा पास कर ली और जब एक ईसाई स्कूल में नौकरी के लिये आवेदन दिया तो उसकी पारिवारिक स्हिृाति को देखते हुये उसको वहां पर लिपिक की नौकरी मिल गई हृाी।सो इस प्रकार दोनों परिवारों में खून का कोई भी रिश्ता ना होते हुये भी उससे भी महत्वपूर्ण संबह्या जुड़ गया। दोनों के घरों में आपसी आना¬जाना कायम हो गया। फिर कुछ और समय बीता और नीरव का स्हृाानान्तरण हुआ तो उसे भटकोई शहर छोड़ना पड़ा और वह अपने परिवार के साहृा मंडरोक आ गया और अपनी नौकरी और परिवार में व्यस्त हो गया। लेकिन फिर भी तारा और उसके परिवार से उसका संबंह्या टेलीफोन के द्वारा जुड़ा ही रहा। इसके साहृा वह हर साल रक्षाबंह्यान के समय पर तारा के घर जाता ही रहा। जब कभी किसी वर्ष वह नहीं जा सका तो तारा उसकी राख़ी डाक के द्वारा भेज देती हृाी।
इस प्रकार दोनों परिवारों के दिन इसी तरह से व्यतीत हो रहे हृो। तारा और नीरव अक्सर ही फोन के ज़रिये बात कर लिया करते हृो। तब एक दिन रात में दो बजे अचानक से तारा का फोन नीरव के पास आया तो वह रोने लगी। उसके रोने का कारण ्र उसके पति ने उसको मारा हृाा। यह सुनकर नीरव की नींद ही उड़ गई। जब नीरव ने तारा से और पूछा तो उसे पता चला कि उसका पति प्रायÁ ही उस पर हाहृा छोड़ देता हृाा। ऐसा तारा के लिये होना कोई नई बात नहीं हृाी। पर इस बार तो उसने हद ही कर दी हृाी। तब नीरव ने तारा के पति से इस संबंह्या में बात करनी चाही तो उसने मना कर दिया। तब उस दिन किसी प्रकार नीरव की रात कटी। उसने तारा को किसी प्रकार समझा¬बुझा दिया। लेकिन दूसरे दिन तारा का फोन फिर से नीरव के पास आ गया। इस बार भी उसका फोन करने का कारण उसके पति के द्वारा उसे मारना¬पीटना ही हृाा। तारा ने नीरव को अपने पति की इस बात के लिये बताया हृाा ्र सो उसने इसी कारण उसे फिर से मारा हृाा। इस बार इतना अह्यिाक उसने मारा हृाा कि वह कई दिनों तक स्कूल अपने काम तक पर नहीं जा सकी हृाी। तब बहुत सोचने और समझने और अपनी पत्नि की सलाह पर नीरव को यही निर्णय लेना पड़ा कि वह स्वंय भटकोई जाकर तारा के यहां जाये और परिस्हिृाति को देखते हुये उसके पति को समझाये और उससे सहजता से बात करे।
तब दूसरे दिन छुट्टी लेकर जब नीरव तारा के घर भटकोई पहुंचा तब तक शाम गहरा चुकी हृाी ्र और रात्रि ने अपने पैर पसारने आरंभ कर दिये हृो। फिर यूं भी मंडरोक से चलने वाली टे्रन केवल पेसिंजर गाड़ी ही हृाी ्र उसे तो देर से पहुंचना ही हृाा। नीरव ने फिर जैसे ही तारा के घर पहुंच कर उसका द्वार खटखटाया तो संयोग से उसके पति ने ही द्वार को खोला। नीरव को यूं अपने घर अचानक से आये देख उसका पति चौंंका तो पर उसने बाकायदा फिर भी नीरव का स्वागत किया। घर में आकर तारा का उदास चेहरा देखते ही नीरव को समझते देर नहीं लगी कि सचमुच घर में तनाव के तार खिंचे हुये हृो। तारा ने किसी प्रकार नीरव को चाय आदि बनाकर दी और बाद में वह उसके खाना आदि बनाने की तैयारी करने लगी। फिर चाय आदि से निबटने के पश्चात तारा के पति ने ही बात करना आरंभ की। वह नीरव को एक संशय से देखते हुये बोला ्र
“यूं कैसे अचानक से आना हो गया भाई साहब? कोई कारण हृाा क्या?”
नीरव तो चाहा ही रहा हृाा कि तारा का पति ही पहले होकर बात आरंभ करे। वह छूटते ही बोला ्र
“एक औरत पर हाहृा उठाना ्र और वह भी उस पर जो आपकी बीबी है ्र यह कहां की इंसानियत और मर्दानगी है?”
“इसका मतलब है कि इसने खूब नमक¬मिर्च मिलाकर शिकायतें की हैं तुमसे।”
“यह तो ज़ाहिर ही है कि जब बहन को तकलीफ होगी तो वह अपने भाई से ही तो कहेगी।” नीरव बोला तो तारा का पति जैसे एक दम ही झुंझला उठा। बोला ्र
“बहन का रिश्ता लेकर आये हो या फिर कोई अन्य रिश्ता तो नहीं जोड़ बैठे हो।”
“ज़रा होश में आकर बात करो जीजा जी। लगता है कि कहीं पी के तो नहीं आये हो।”
“होश में ही कह रहा हूं।”
“तो फिर क्यों उठाते हो अपनी बीबी पर हाहृा?”
“अपनी बीबी को तो मैं जिस दिन से यह मेरे घर में आई है ्र उसी दिन से पीटता आया हूं। तुम्हें क्या मालुम यह तो इसी लायक है।”
“लेकिन आज के बाद तारा को मारा तो फिर . .. . . . . .” नीरव कहते हुये रूका तो उसका पति बोला ्र
“मेरे हाहृा तोड़ दोगे?”
“नहीं ्र हाहृों को ऐसा कर दूंगा कि एक निवाला रोटी का भी खाना मुश्किल हो जायेगा।”
“?” नीरव की इस बात पर तारा के पति ने उसे जी भर के घूरा। फिर अपनी आंखें निकालता हुआ उससे बोला ्र
“फिर कभी तो क्या देख मैं अभी इसे तेरे ही सामने पीट कर दिखाता हूं। देखता हूं कि तू क्या करता है?” यह कहते हुये तारा का पति जैसे ही तारा की तरफ बढ़ा नीरव तुरन्त ही उसके सामने आ गया। बोला ्र
“दिमाग तो नहीं फिर गया है आपका?”
“अभी बताता हूं कि किसका दिमाग फिर गया है।” कहते हुये तारा के पति ने वहीं मेज पर रखा हुआ कांच का गुलदान उठा लिया और उसके अन्दर रखे हुये फूल फेंकता हुआ ्र उससे नीरव को मारने के लिये आगे बढ़ने लगा। यह सब देखकर नीरव ने उससे फिर कहा कि ्र
“अपनी हद से आगे बढ़ रहे हो जीजा जी! ऐसा न हो कि फिर मेरा भी हाहृा उठ जाये।”
तारा जो इस समय सब्जी काट रही हृाी ्र ने जो यह सब देखा तो वह वैसे ही सब्जी काटने का चाकू हाहृा में पकड़े हुये उन दोनों के बीच में आ गई। आते ही चिल्लाते हुये बोली ्र
“यह क्या करने लगे हो तुम दोनों?”
तभी नीरव को ना जाने क्या सूझी कि उसने फौरन ही तारा के हाहृा से सब्जी काटने का चाकू छीन लिया और अपनी सुरक्षा के लिये तारा के पति को देखने लगा। नीरव के हाहृों में चाकू देखकर तारा का पति तारा से बोला ्र
“देखा ्र जिसको तूने अपना भाई बनाया है वही तेरा सुहाग मिटाने पर तुला हुआ है।”
यह सुन कर नीरव ने तुरन्त ही चाकू दूर फेंक दिया। तब बात कहीं फिर से और ना बढ़ जाये तारा नीरव से बोली ्र
“क्यों आ गये हो तुम यहां। मत आया करो। मैं ऐसे ही भली हूं। जाओ चले जाओ यहां से और फिर कभी इह्यार का मुंह मत करना। सोच लो तुम्हारी बहन मर चुकी है।” रोते हुये वह नीरव को घर के बाहर के दरवाज़े तक ले गई और उसे बाहर निकालकर अन्दर से दरवाज़ा बंद कर लिया और फिर फूट¬फूट कर रोने लगी।
नीरव बड़ी देर तक बाहर खड़ा¬खड़ा तारा की रोने की आवाज़ सिसकियां सुनता रहा। फिर काफी देर के बाद वह वहां से चुपचाप चला आया। औरत चाहे वह बहन या बेटी ही क्यों न हो ्र अपने विवाह के बाद कितनी आसानी से दूसरे के अह्यिाकार में चली जाती है ्र जीवन का यह कड़वा सत्य उसकी समझ में आ चुका हृाा। मांग में सिन्दूर आते ही अपने घर के तमाम भाई ्र बहन और मां¬बाप तक के अह्यिाकार किसकदर कमज़ोर पड़ जाते हैं ्र वह यह सच भी भली¬भांति समझ चुका हृाा।
मडंरोक जाने वाली पैंसिजर गाड़ी तैयार होकर प्लेटफॉर्म पर लग चुकी हृाी। शन्टिंग करता हुआ उसका इंजन गाड़ी से जुड़ चुका हृाा। काफी कुछ यात्री भी उसमें जाकर बैठ गये हृो। आकाश में चमकती हुई तमाम तारिकायें ्र नीरव की तारिका के समान ही सारी रात रोते हुये अब टिमटिम करके कभी भी समाप्त हो जाने का सन्देश देने लगी हृाीं। नीरव ने चुपचाप अपना स्थान छोड़ा और फिर बड़े ही निराश मन से गाड़ी में आकर बैठ गया। उन्हीं सीढ़ियों पर एक बार फिर से चढ़ने के लिये ्र जिनसे कभी वह कभी नीचे उतरा हृाा। वह जानता हृाा कि इस बार उन सीढ़ियों से उतरने के पश्चात उसको अब तारा फिर कभी भी नहीं मिलेगी। आकाश की गोद से टूट कर गिरने वाली ‘तारिका’ कहां जाकर लुप्त हो जाती है ्र इस भेद को शायद कोई भी नहीं जान सका।

-समाप्त.